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विज्ञान

धरती से खत्म होने वाली है मानवता,पृथ्‍वी का सिस्‍टम गड़बड़ाया


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नई दिल्लीः वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि पृथ्वी पर मौजूद वह सिस्‍टम जिसकी वजह से जीवन संभव है बहुत ज्‍यादा क्षतिग्रस्त हो चुका है। इसे इतना ज्‍यादा नुकसान पहुंचा है कि यह ग्रह अब मानवता के लिए सुरक्षित जगह बनने से काफी बाहर हो गया है। उन्‍होंने अपनी जांच में पाया कि नौ में से छह ग्रहीय सीमाएं इंसानों की वजह से बढ़े प्रदूषण और प्राकृतिक दुनिया के विनाश की वजह से खत्‍म हो गई हैं। उनका कहना है कि ये सीमाएं दरअसल प्रमुख ग्‍लोबल सिस्‍टम की सीमाएं हैं, जैसे कि जलवायु, जल और वन्यजीव में विविधता। लेकिन अब इसके क्षतिग्रस्‍त हो जाने से एक स्वस्थ ग्रह को बनाए रखने की क्षमता के असफल होने का खतरा बढ़ गया है।

विकास की दौड़ में पूरी दुनिया नए-नए अविष्‍कार तो कर रही है, लेकिन साथ ही जलवायु को काफी नुकसान भी पहुंवा रही है. ऐसे में इंसानों की सेहत और हमारे ग्रह की सुरक्षा को खतरा भी बढ़ता जा रहा है. वैज्ञानिकों का कहना है कि धरती ने अपनी सुरक्षा की सात सीमाएं लांघ ली है. फिलहाल हम जलवायु की आखिरी सुरक्षित सीमा में जीवन यापन कर रहे हैं. उनका कहना है कि जलवायु धरती को सुरक्षित रखने की ज्‍यादातर सीमाएं पार कर चुकी है. लिहाजा, ये बहुत ही जरूरी हो जाता है कि पेरिस समझौते के लक्ष्‍यों को पूरा करने के लिए हमें तेजी से काम करना होगा.

क्या धरती से हमेशा के लिए मानवता का नामो-निशां मिटने वाला है, क्या धरती पर सबकुछ खत्म हो जाएगा, क्या धरती पर कोई बड़ी तबाही आने वाली है, क्या फिर से धरती पर हिमयुग की वापसी हो सकती है?…यह सब सवाल इसलिए हैं कि धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है और वैज्ञानिकों के अनुसार इसे रोका नहीं गया तो महाविनाश होने से कोई बचा नहीं सकता। पेरिस जलवायु समझौते को जब 2015 में अपनाया गया तो इसके माध्यम से पृथ्वी पर मानवता के सुरक्षित भविष्य की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया।

सिस्‍टम सुरक्षित स्थिति से हुआ दूर
वैज्ञानिकों ने बताया है कि ग्रहों की टूटी हुई सीमाओं का मतलब यानी सिस्टम एक सुरक्षित और स्थिर स्थिति से बहुत दूर चला गया है। यह सिस्‍टम 10000 साल पहले यानी अंतिम हिमयुग के अंत से लेकर औद्योगिक क्रांति की शुरुआत तक मौजूद था। संपूर्ण आधुनिक सभ्यता की शुरुआत इसी समय में हुई है जिसे होलोसीन भी कहा जाता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह जांच मल्यांकन सभी नौ ग्रहों की सीमाओं में से पहला था और पूरे ग्रह के लिए पहली वैज्ञानिक स्वास्थ्य जांच का प्रतिनिधित्व करता था। उनका कहना है कि छह सीमाएं टूट गई हैं तो दो टूटने के करीब हैं। ये दो हैं वायु प्रदूषण और महासागरों में एसिड का बढ़ना।

वैज्ञानिकों का कहना है कि धरती पर सुरक्षा की आठ प्राकृतिक परतें होती हैं. ये लेयर्स ही इंसानों और बाकी जीवों को सुरक्षित व स्‍वस्‍थ रखती हैं. नेचर जर्नल में प्रकाशित इस अध्‍ययन को दुनियाभर के 40 से अधिक वैज्ञानिकों की टीम ने किया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अब हमारा ग्रह इंसानों के रहने लायक नहीं रह गया है. शोधकर्ताओं के मुताबिक, इंसान ने धरती को सुरक्षित रखने वाली हर सीमा को लांघ लिया है. वैज्ञानिकों ने मौजूदा हालात को देखते हुए इंसानों के भविष्य पर चिंता जताई है.

समझौते पर तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के संकल्प के साथ दुनिया भर के 196 दलों ने हस्ताक्षर किए थे, जो मानवता के भारी बहुमत का प्रतिनिधित्व करते थे। लेकिन बीच के आठ वर्षों में, आर्कटिक क्षेत्र ने रिकॉर्ड तोड़ तापमान का अनुभव किया, गर्मी की लहरों ने एशिया के कई हिस्सों को जकड़ लिया और ऑस्ट्रेलिया ने अभूतपूर्व बाढ़ और जंगल की आग का सामना किया। ये घटनाएं हमें जलवायु परिवर्तन से जुड़े खतरों की याद दिलाती हैं। इसके बजाय हमारे नए प्रकाशित शोध तर्क देते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग या उससे नीचे के 1 डिग्री सेल्सियस पर ही मानवता सुरक्षित है। जबकि एक चरम घटना को पूरी तरह से वैश्विक तापन के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है, वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि गर्म दुनिया में ऐसी घटनाओं की संभावना अधिक होती है।

नेवर जर्नल में प्रकाशित अध्‍ययन रिपोर्ट के मुताबिक, हमें प्रकृति से मिली सभी चीजें प्रदूषित हो चुकी हैं. धीरे-धीरे इंसान का जीना मुश्किल होता जा रहा है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, हमारे ग्रह धरती और हमारी सुरक्षा सीमाओं में जलवायु, जैव विविधता, मीठा पानी, हवा, मिट्टी और पानी शामिल हैं. इन सभी में जहर का स्‍तर बहुत ज्‍यादा हो गया है. इस वजह से धरती का पर्यावरण खतरे में पड़ गया है. इसका असर इंसानी जीवन पर पड़ रहा है. वैज्ञानिकों ने शोध में पाया कि धरती पर जीवन की सुरक्षा के कंपोनेंट खतरनाक स्‍तर पर पहुंच चुके हैं.

एक सीमा जिसे खतरा नहीं है वह वायुमंडलीय ओजोन है। हाल के दशकों में विनाशकारी रसायनों को एक फेज में खत्‍म करने के तरीके से खत्‍म करने की कार्रवाई की वजह से ओजोन का छेद सिकुड़ गया है। वैज्ञानिकों ने कहा कि सबसे चिंताजनक नतीजा यह है कि सभी चार जैविक सीमाएं, जो जीवित दुनिया में मौजूद हैं, उच्चतम जोखिम स्तर पर या उसके करीब थीं। जीवित दुनिया पृथ्वी के लिए खासतौर पर महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि यह कुछ भौतिक परिवर्तनों की भरपाई करके लचीलापन प्रदान करती है जैसे ही कार्बन डाइऑक्साइड प्रदूषण को सोखने वाले पेड़।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, धरती और यहां रहने वाली हर जीवित प्रजाति को सुरक्षा मुहैया कराने वाले कंपोनेंट ही अगर खतरे में पड़ जाएंगे तो इसकी कल्‍पना करना मुश्किल नहीं है कि हमारा व हमारे ग्रह का क्‍या होगा. लेख के मुताबिक, वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु ने 1-सी की सीमा लांघ ली है. लाखों लोग पहले ही बदलती जलवायु की चपेट में आ चुके हैं. पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इंपैक्ट रिसर्च के प्रोफेसर जोहान रॉकस्ट्रॉम के मुताबिक, हमारे स्वास्थ्य जांच के नतीजे बेहद चिंताजनक हो चुके हैं.

पेरिस समझौते के बाद से, वैश्विक तापन के प्रभावों के बारे में हमारी समझ में भी सुधार हुआ है। समुद्र का बढ़ता स्तर ग्लोबल वार्मिंग का एक अनिवार्य परिणाम है। यह बढ़ी हुई भूमि की बर्फ के पिघलने और गर्म महासागरों के संयोजन के कारण है, जिससे समुद्र के पानी की मात्रा बढ़ जाती है। हाल के शोध से पता चलता है कि समुद्र के स्तर में वृद्धि के मानव-प्रेरित घटक को खत्म करने के लिए, हमें पूर्व-औद्योगिक युग (आमतौर पर 1850 के आसपास) में आखिरी बार देखे गए तापमान पर लौटने की जरूरत है। शायद अधिक चिंताजनक जलवायु प्रणाली में टिपिंग बिंदु हैं जो पारित होने पर मानव कालक्रम पर प्रभावी रूप से अपरिवर्तनीय हैं। इनमें से दो टिपिंग पॉइंट ग्रीनलैंड और वेस्ट अंटार्कटिक बर्फ की चादरों के पिघलने से संबंधित हैं। साथ में, इन चादरों में वैश्विक समुद्र स्तर को दस मीटर से अधिक ऊपर उठाने के लिए पर्याप्त बर्फ है।

संयुक्त राष्‍ट्र के सदस्य देश 2015 से वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने पर सहमत हुए हैं. इसके अलावा दुनिया की 30 फीसदी भूमि, समुद्र और मीठे पानी के क्षेत्रों में जैव विविधता की रक्षा करने पर भी सहमति बनी है. पृथ्वी आयोग के वैज्ञानिकों का कहना है कि मौजूदा हालात में हम अपने तय लक्ष्यों को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं. वैज्ञानिकों ने कहा है कि धरती पर हर बदलाव को व्यवस्थित करने का समय आ चुका है. हम संतुलन बनाकर खतरे को कुछ समय के लिए टाल सकते हैं.

वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी के क्षरण को रोकने के लिए धरती पर मौजूद संसाधनों के इस्‍तेमाल को सीमित करना चाहिए. ये भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सभी उपलब्‍ध संसाधन गरीबों तक पहुंच जाएं. एम्स्टर्डम यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर और अध्‍ययन की सह-लेखिका जोइता गुप्ता का कहना है कि ग्रहों की सीमाओं के भीतर सुरक्षित रहने के लिए मानवता के साथ न्याय की भावना भी जरूरी है.

वैज्ञानिकों ने कहा कि ग्रहों की सीमाओं को बदला नहीं जा सकता है कि जिसके आगे अचानक और गंभीर गिरावट हो। इसके बजाय ये सीमाएं ऐसे बिंदु हैं जिनके बाद पृथ्वी के भौतिक, जैविक और रासायनिक जीवन समर्थन प्रणालियों में परिवर्तनों का जोखिम काफी बढ़ जाता है। ग्रहों की सीमाएं पहली बार साल 2009 में तैयार की गईं और साल 2015 में इन्‍हें अपनाया गया। उस समय सिर्फ सात ग्रहों की ही जांच की जा सकी थी। उस समय स्टॉकहोम रेजिलिएंस सेंटर के डायरेक्‍ट प्रोफेसर जोहान रॉकस्ट्रॉम ने इसे तैयार करने वाली टीम को लीड किया था। उनका कहना है कि विज्ञान और दुनियाभर में समाजों पर पड़ने वाली सभी चरम जलवायु घटनाओं को लेकर वास्तव में चिंतित हैं। लेकिन जो बात और भी अधिक चिंतित करती है, वह है ग्रहों की घटती लचीलापनऔर यह काफी खतरनाक है।

ऐतिहासिक साक्ष्यों से पता चलता है कि एक अवधि जिसे “लघु हिमयुग (1400-1850) ” कहा जाता है, जब उत्तरी गोलार्ध में ग्लेशियर बड़े पैमाने पर विकसित हुए थे और थेम्स नदी पर हर साल सर्दी मेले आयोजित किए जाते थे, यह बहुत कम तापमान परिवर्तन सिर्फ 0.3 डिग्री सेल्सियस के कारण होता था। ऐसे भी सबूत हैं जो बताते हैं कि पश्चिमी अंटार्कटिका के एक हिस्से में यह सीमा पहले ही पार कर ली गई होगी। गंभीर सीमाएँ 1.5 डिग्री सेल्सियस का तापमान परिवर्तन काफी छोटा लग सकता है। लेकिन यह ध्यान देने योग्य है कि लगभग 12,000 साल पहले आधुनिक सभ्यता का उदय औ

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