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जानिये अजीब बीमारी डिमेंशिया के लक्षणों के बारे में

मुंबई – आज के इस आधुनिक और भागदौड़ वाले जीवन में आमतौर पर हम में से ज्यादातर लोगो को स्वास्थ्य से संबंधित कई दिक्कतों का सामना करना पड रहा है। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने ‘ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट ऑन द पब्लिक हेल्थ रिस्पांस टू डिमेंशिया’ नामक एक रिपोर्ट जारी की। आज हम आपको एक अजीब बीमारी डिमेंशिया के बारे में कुछ जानकारी देते है।

मनोभ्रंश एक सिंड्रोम है, आमतौर पर एक पुरानी या प्रगतिशील प्रकृति का – जो उम्र बढ़ने के जैविक सिद्धांत के सामान्य परिणामों से भिन्न, संज्ञानात्मक कार्य (अर्थात् सोचने की प्रक्रिया क्षमता) में गिरावट की ओर ले जाता है। यह स्मृति, सोच-विचार, अभिविन्यास, समझ, गणना, सीखने की क्षमता, भाषा और निर्णय को प्रभावित करता है। इसमें चेतना प्रभावित नहीं होती है। मनोभ्रंश के कारण होने वाली कुल मौतों में से 65% महिलाएँ हैं और मनोभ्रंश के कारण विकलांगता-समायोजित जीवन वर्ष पुरुषों की तुलना में महिलाओं में लगभग 60% अधिक है।

अल्जाइमर सोसायटी के अनुसार, पुरुषों की तुलना में महिलाएं डिमेंशिया से अधिक प्रभावित होती है। वास्तव में, जब इस स्थिति की बात आती है तो महिलाएं दुनिया भर में पुरुषों से दो-एक के अंतर से आगे निकल जाती है। ब्रेन स्कैन के अनुसार, महिलाओं के मस्तिष्क की कोशिकाएं पुरुषों की तुलना में तेजी से मरती हुई दिखाई देती है। इस आंकड़े में योगदान देने वाला एक अन्य कारक यह है कि महिलाएं अधिक समय तक जीवित रहती हैं; हालाँकि, डिमेंशिया न केवल उम्र के कारण होता है, बल्कि मस्तिष्क की बीमारियों के कारण भी होता है। डिमेंशिया के रोगी पहले की गतिविधियों में रुचि खोना शुरू कर सकते है। इसके परिणामस्वरूप वे अधिक भावुक और उदास भी हो सकते है। जब संज्ञानात्मक गिरावट की बात आती है तो पुरुषों और महिलाओं के बीच का अंतर केवल लक्षणों में दिखाई देने से कहीं अधिक हो सकता है।

अल्जाइमर रोग और डिमेंशिया सबसे आम मनोभ्रंश है। 45 साल की उम्र में सिंड्रोम का पता लगाया जा सकता है। इस तथ्य के बावजूद कि इस स्थिति का कोई इलाज नहीं है, जल्दी पता लगाने से इसकी प्रगति को धीमा करने या किसी व्यक्ति के मानसिक कार्य को लम्बा करने में मदद मिल सकती है। इसमें स्मृतिलोप, सोचने में कठिनाई, दृश्य धारणा, स्व-प्रबंधन, समस्या समाधान या भाषा और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता जैसे लक्षण शामिल है। इसमें व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन होता है जैसे- अवसाद, व्याकुलता, मानसिक उन्माद और चित्तवृति या मनोदशा।

जब मस्तिष्क की कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त हो जाती है तो मनोभ्रंश की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। यह सिर में चोट, स्ट्रोक, ब्रेन ट्यूमर या एचआईवी संक्रमण के कारण हो सकता है। मनोभ्रंश को ठीक करने के लिये वर्तमान में कोई उपचार उपलब्ध नहीं है, हालाँकि नैदानिक परीक्षणों के विभिन्न चरणों में कई नए उपचारों की जाँच की जा रही है। डिमेंशिया वर्तमान में सभी प्रकार की बीमारियों से होने वाली मृत्यु का सातवांँ प्रमुख कारण है जो वैश्विक स्तर पर वृद्ध लोगों में विकलांगता और दूसरों पर निर्भरता के प्रमुख कारणों में से एक है। बता दे की 55 मिलियन से अधिक लोग (8.1% महिलाएंँ और 65 वर्ष से अधिक आयु के 5.4% पुरुष) डिमेंशिया के साथ जी रहे है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2030 तक यह संख्या बढ़कर 78 मिलियन और वर्ष 2050 तक 139 मिलियन हो जाने का अनुमान है। WHO के पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में डिमेंशिया (20.1 मिलियन) से पीड़ित लोगों की संख्या सबसे अधिक है तथा इसके बाद यूरोपीय क्षेत्र (14.1 मिलियन) का स्थान है। WHO इस बीमारी को रोकने के लिए कई प्रयास कर रही है। जिसमे ग्लोबल एक्शन प्लान ऑन द पब्लिक हेल्थ रिस्पांस टू डिमेंशिया 2017-2025, मेंटल हेल्थ गैप एक्शन प्रोग्राम, वैश्विक मनोभ्रंश वेधशाला शामिल है। WHO के अलावा भारत में भी कई प्रयास चल रहे है। भारत में अल्ज़ाइमर्स एंड रिलेटेड डिसऑर्डर्स सोसाइटी ऑफ इंडिया और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत इस बीमारी को रोकने के प्रयास जारी है।

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