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तलाक के बाद मुस्लिम महिला भी पति से मांग सकती है गुजारा भत्ता, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

नई दिल्लीः देश की सर्वोच्च अदालत ने आज मुस्लिम महिलाओं के लिए एक बड़ा फैसला दिया है. अब मुस्लिम महिलाएं भी अपने पति के खिलाफ सीआरपीसी की धारा-125 के तहत भरण-पोषण के लिए याचिका दायर कर सकती हैं. कोर्ट के इस फैसले से उन मुस्लिम महिलाओं को राहत मिली है जिनका तलाक हो चुका है या पति से अलग रहने को मजबूर हैं.

क्या है मामला?

अब्दुल समद नाम के एक मुस्लिम शख्स ने पत्नी को गुजारा भत्ता देने के तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट में शख्स ने दलील दी थी कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत याचिका दायर करने की हकदार नहीं है। महिला को मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 अधिनियम के प्रावधानों के तहत ही चलना होगा। ऐसे में कोर्ट के सामने सवाल था कि इस केस में मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 को प्राथमिकता मिलनी चाहिए या सीआरपीसी की धारा 125 को।तेलंगाना उच्च न्यायालय ने 13 दिसंबर 2023 को समद की पत्नी को अंतरिम गुजारे भत्ते के भुगतान के संबंध में परिवार अदालत के फैसले पर रोक नहीं लगाई थी। हालांकि, उसने गुजारा भत्ता की राशि प्रति माह 20 हजार रुपये से घटाकर 10 हजार कर दी थी, जिसका भुगतान याचिका दाखिल करने की तिथि से किया जाना था।

गुजारा भत्ता कोई दान नहीं

पीठ ने आगे कहा कि गुजारा भत्ता कोई दान नहीं है, बल्कि शादीशुदा महिलाओं का अधिकार है। ये धारा सभी विवाहित महिलाओं पर लागू होती है, फिर चाहे उनका धर्म कुछ भी हो। मुस्लिम महिलाएं भी इस प्रावधान का सहारा ले सकती हैं। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने फैसला सुनाते हुए कहा, ‘हम आपराधिक अपील को इस निष्कर्ष के साथ खारिज कर रहे हैं कि धारा 125 सभी महिलाओं पर लागू होगी, न कि केवल विवाहित महिलाओं पर।’

क्या है सीआरपीसी की धारा 125?

सीआरपीसी की धारा 125 में पत्नी, संतान और माता-पिता के भरण-पोषण को लेकर विस्तार से जानकारी दी गई है। इस धारा के अनुसार पति, पिता या बच्चों पर आश्रित पत्नी, मां-बाप या बच्चे गुजारे-भत्ते का दावा केवल तभी कर सकते हैं, जब उनके पास आजीविका का कोई और साधन उपलब्ध नहीं हो।.

क्या है मुस्लिम महिलाओं को लेकर नियम?

बता दें कि मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता नहीं मिल पाता है। अगर गुजारा भत्ता मिलता भी है तो सिर्फ इद्दत तक। दरअसल, इद्दत एक इस्लामिक परंपरा है, जिसके अनुसार, अगर किसी महिला को उसके पति ने तलाक दे दिया तो वो महिला इद्दत की अवधि तक शादी नहीं कर सकती है। इद्दत की अवधि तीन महीने तक रहती है।

तेलंगाना के शख्स ने लगाई थी याचिका

ताजा मामले में एक मुस्लिम शख्स ने फैमिली कोर्ट और तेलंगाना हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें उसे तलाकशुदा पत्नी को भरण-पोषण देने के लिए कहा गया था.महिला ने शुरुआत में फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग की थी. फैमिली कोर्ट ने महिला के पति को भरण-पोषण के तौर पर 20 हजार रुपये देने का आदेश दिया, फैमिली कोर्ट के इसी फैसले को तेलंगाना हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. वहीं हाईकोर्ट ने भरण-पोषण के आदेश को बरकरार रखा, लेकिन पत्नी को देने वाले भरण-पोषण की रकम कम कर दी.

कोर्ट में क्या हुआ?

मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मुस्लिम महिला सीआरपीसी की ‘धर्म तटस्थ’ धारा-125 के तहत पति से गुजारा भत्ता मांगने की हकदार है। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस नागरथन और जस्टिस जॉर्ज मसीह की पीठ ने आज इस मामले की विस्तृत सुनवाई करते हुए दो अलग-अलग लेकिन समवर्ती फैसले दिये हैं।

कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?

पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला देते हुए कहा कि एक भारतीय विवाहित पुरुष को इस बात के प्रति सचेत रहना चाहिए कि अगर उसकी पत्नी आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं है तो पति को उसके लिए उपलब्ध रहना होगा। इस तरह के सशक्तिकरण का मतलब उसके संसाधनों तक पहुंच होगी। कोर्ट ने कहा कि जो भारतीय पुरुष अपने निजी या व्यक्तिगत खर्च से ऐसा करते हैं उससे कमजोर महिलाओं की मदद होती है और ऐसे पति के प्रयासों को स्वीकार किया जाना चाहिए।

महिला शादी नहीं कर सकती

उन्होंने कहा कि जो लोग यह मानते हैं की अदालत के जरिए उनका भरण पोषण हो जाएगा वह वहां बेशक जा सकते हैं, लेकिन समस्या एक यह है कि अलग होने के बाद भी तलाक नहीं होता है और महिला शादी नहीं कर सकती. इसलिए यह एक अननेचुरल तरीका है.

भारतीय पुरुषों को गृहिणियों को जानने की जरुरत

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि CRPC की धारा 125 सभी महिलाओं पर लागू होगी, न केवल विवाहित महिलाओं पर. अदालत का कहना है कि गुजारा भत्ता दान नहीं बल्कि शादीशुदा महिलाओं का अधिकार है. जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी में कहा कि कुछ पतियों को ये पता ही नहीं है कि कई गृहणियां हैं, जो भावनात्मक रूप से ही नहीं बल्कि कई तरह से उन पर निर्भर रहती हैं. उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि भारतीय पुरुषों को गृहिणी की भूमिका को जानने की जरूरत है.

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