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ऐ वतन मेरे वतन रिव्यू : चुनावी माहौल में कांग्रेस रेडियो की प्रेरक और गुमनाम नायकों की कहानी,कैसी है सारा अली खान की मूवी -जानें

मुंबई – देश में चुनावी माहौल है। कांग्रेस अलग अलग सूबों में ढहते अपने किले सहेजने में लगी है और ऐसे में विदेशी ओटीटी प्राइम वीडियो पर प्रसारित हुई है एक ऐसी कहानी जो हमें बताती है कि देश की आजादी में सिर्फ गांधी, नेहरू और चंद दूसरे प्रसिद्ध लोगों का ही खून-पसीना शामिल नहीं है बल्कि ये आजादी मिली है उन तमाम ऐसे गुमनाम नायकों की भी हिम्मत और हौसलों से जिन्होंने अपने अपने इलाकों में डटे रहते हुए अंग्रेजी अत्याचार का मुकाबला किया। 24 साल पहले यह लोक छोड़ गईं गांधीवादी कांग्रेस नेता उषा मेहता की कहानी कहती फिल्म ‘ऐ वतन मेरे वतन’ शुरू से राम मनोहर लोहिया को नेहरू की नीतियों का विरोधी बताते हुए चलती है। जर्मनी से उनकी पढ़ाई को भी रेखांकित करती है और ये बताने की कोशिश करती है कि देश को आजादी असल में उन दिनों के संघर्ष से मिली, जब ये तमाम बड़े नेता तो जेल में थे। उषा मेहता को साल 1998 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया था।

देशभक्ति की पीरियड फिल्म

सारा अली खान और वो भी देशभक्ति की पीरियड फिल्म? फिर उषा मेहता जैसा कैरेक्टर? सुनकर कैसा लगा? बेशक थोड़ा चौंके होंगे. बिल्कुल जब मैंने ‘ऐ वतन मेरे वतन’ देखी तो मेरे भी एक्सप्रेशन कुछ ऐसे ही थे. एक शानदार ऐतिहासिक कैरेक्टर को एक फिल्म के जरिये इतने हल्के अंदाज में पेश करना वाकई हैरान करने वाला था. फिल्म को करण जौहर ने प्रोड्यूस किया है और इसका डायरेक्शन कन्नन अय्यर का है. यही नहीं, ओटीटी पर बॉलीवुड की अधिकतर बेहद कमजोर फिल्में ही रिलीज होती हैं, मेरी इस सोच को ‘ऐ वतन मेरे वतन’ ने पुख्ता ही किया है. सारा अली खान के अलावा फिल्म में इमरान हाशमी, आनंद तिवारी, सचिन खेड़ेकर, अभय वर्मा और स्पर्श श्रीवास्तव लीड रोल में हैं.

फिल्म की कहानी?

बम्बई (मुंबई) में रहने वाले जज हरिप्रसाद मेहता की बेटी उषा मेहता (सारा अली खान) बचपन से ही गांधीवाद से प्रेरित है और देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी के लिए जुनून से भरी हुई है। आंखों के सामने अंग्रेजों के जुल्म उसके इरादे को मजबूती देते हैं। हालांकि, ब्रिटिश सरकार की चाकरी करते हुए सुविधाओं का लुत्फ उठा रहे जज पिता हरिप्रसाद मेहता (सचिन खेड़ेकर) को बेटी का क्रांतिकारी स्वभाव अखरता है।

ऐ वतन मेरे वतन का ट्रेलर

लगभग सवा दो घंटे की फिल्म ‘ऐ वतन मेरे वतन’ किसी भी मौके पर ना तो एंटरटेन कर पाती है और ना ही इतिहास के एक महत्वपूर्ण पात्र और उसकी जिंदगी को ही सशक्त तरीके से दिखा पाती है. फिर जिस तरह की सारा अली खान ने एक्टिंग की है, वह तो कोढ़ में खाज का काम करती है. उषा मेहता के किरदार के लिए सारा का चयन पूरी तरह से किरदार के साथ नाइंसाफी थी.वैसे भी पिछले हफ्ते मर्डर मुबारक में हमने सारा अली खान की निराश कर देने वाली एक्टिंग देख ली थी. ‘ऐ वतन मेरे वतन’ में जिस तरह से कैरेक्टर तैयार किए गए हैं, वह कहीं भी आजादी के आंदोलन से जुड़ी फिल्म के पात्र कम, बल्कि एक कॉस्ट्यूम शो के मॉडल ज्यादा लगते हैं. इस तरह अमेजॉन प्राइम वीडियो की इस फिल्म ने साबित किया है कि ओटीटी पर अच्छी फिल्में डायरेक्ट रिलीज नहीं होती हैं.

कैसा है ए वतन मेरे वतन का स्क्रीनप्ले?

दारब फारुकी और कन्नन अय्यर लिखित ए वतन मेरे वतन की कथाभूमि मुख्य रूप से 30-40 के दौर की बम्बई है, जहां उषा अपने पिता और उनकी वयोवृद्ध बुआ के साथ रहती है। फिल्म उषा मेहता की निजी जिंदगी में ज्यादा ताकझांक नहीं करती।

कलाकार की एक्टिंग कैसी है ?

ए वतन मेरे वतन का कमजोर पक्ष अभिनय भी है। नेटफ्लिक्स की फिल्म मर्डर मुबारक के बाद सारा अली खान की एक हफ्ते के अंदर ओटीटी पर दूसरी फिल्म है। उनकी यह पहली पीरियड फिल्म भी है।सारा ने उषा मेहता के बागी तेवरों को उभारने की कोशिश की है। हालांकि, उनका अभिनय दर्शक को कंविंस नहीं कर पाता कि वो 40 के दौर की एक ऐसी क्रांतिकारी को देख रहा है, जो सब कुछ दांव पर लगाकर देश आजाद करवाने निकली है। अन्य किरदारों की संवाद अदाएगी उस दौर का एहसास नहीं होने देती। यह निर्देशन की कमी है। यहां जुबली सीरीज का जिक्र करना लाजिमी है, जो 40-50 के दौर में स्थापित की गई थी। किरदारों का लहजा और संवाद उस दौर का एहसास करवाने में सफल रहे थे।

फिल्म की कमजोर कड़ी हैं सारा के चयन, फिल्म की पटकथा और साथी कलाकार

फिल्म ‘ऐ वतन मेरे वतन’ की कहानी पहले फ्रेम से अपने अनुमानित ढर्रे पर चलती है। कहानी में ऐसा कुछ खास है नहीं जिसे लेकर दर्शकों में उत्तेजना का निर्माण हो सके। फिल्म के शुरू में ही पुलिस के छापे से तनाव बनाने की कोशिश जरूर की जाती है लेकिन बॉयलिंग पॉइंट तक आने से पहले ही कहानी की भाप अपना असर छोड़ देती है। राम मनोहर लोहिया के रूप में इमरान हाशमी कुछ साल बाद दर्शकों को याद भी रह पाएंगे, कन्नन अय्यर को सोचना चाहिए। लोहिया का किरदार उत्तर भारत में कांग्रेस से फूटकर अलग हुई एक अलग पार्टी के नेता के रूप में पहचाना जाता है। सामयिक होता अगर इस पहलू पर फिल्म लिखने वालों ने थोड़ी मेहनत और की होती। सारा के चयन, फिल्म की पटकथा के बाद फिल्म की तीसरी कमजोर कड़ी हैं इसके साथी कलाकार भी हैं।

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