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वैज्ञानिक मैग्नेटर को डरावने क्यों मानते हैं


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नई दिल्ली – ब्रह्माण्ड में कई और भी पिंड है तो अपने अंदर ऐसे रहस्य समेटे हैं जिन्हें सुलझाने में वैज्ञानिक और खगोलविद लंबे समय से लगे हुए हैं. नई शक्तिशाली टेलीस्कोप के आगमन से अब ब्लैक होल और इस तरह के रहस्यमयी पिंडों के बारे बारे में खगोलविद गहन अध्ययन में लगे हैं. इसमें से एक तरह के रोचक पिंड मैग्नेटर (Magnetars) होते हैं जिनके बारे में दुनिया को करीब 5 दशक पहले ही पता चला है. इन शक्तिशाली न्यूट्रॉन तारे (Neutrons) के बारे में वैज्ञानिको को बहुत कम जानकारी है.

तारों का भी ब्रह्माण्ड के दूसरे पिंडों की तरह अपना जीवन चक्र होता है. किसी तारे का अंत कैसा होगा यह उसके भार पर ज्यादा निर्भर करता है. जैसे हमारे सौरमडंल का सूर्य ही भविष्य में विशाल लाल तारा बनकर एक सफेद बौना बनकर खत्म हो जाएगा. वहीं ज्यादा भारी तारे विशाल सुपरनोवा विस्फोट से गुजरते हैं और फिर या तो किसी न्यूट्रॉन तारे या फिर किसी ब्लैक होल में बदल जाते हैं.

मैग्नेटर जैसा कि नाम से ही जाहिर होता है, शक्तिशाली मैग्नेटिक फील्ड वाले पिंड होते हैं जो गामा रे, एक्स रे और रेडियो तरंगों को प्रचंड विस्फोट करते हैं जिससे एक असामान्य रूप से शक्तिशाली मैग्नेटिक फील्ड पैदा होती है. इन्हें सबसे पहले साल 1979 में देखा गया था.उसके बाद से खगोलिविदों ने दर्जनों मैग्नेटर हमारी गैलेक्सी मिल्की वे और उसके आसपास ही देख लिए हैं.

मैग्नेटर ऐसे न्यूट्रॉन तारे होते है जिनके मैग्नेटिक फील्ड का चुंबकीय घनत्व 1013 से 1015 गॉस तक होता है. यह व्यवहारिक तौर पर समझना मुश्किल है, लेकिन ये पूरे ज्ञात ब्रह्माण्ड में सबसे शक्तिशाली चुंबकीय पिंड माने जाते हैं. अभी तक वैज्ञानिक केवल 23 मैग्नेटर की उपस्तिथि की पुष्टि कर सके हैं और छह पुष्टि की प्रतीक्षा में हैं. बहुत से मिल्की वे गैलेक्सी में ही हैं लेकिन पृथ्वी के पास कोई नहीं है.

अगर किसी मैग्नेटर का प्रभाव हमारी पृथ्वी पर पड़ा तो इसका हमारे इलेक्ट्रॉनिक और तकनीकी उपकरणों पर तो पड़ेगा ही हमारे शरीर के अणुओं के बीच की जैवविद्युतकी तक इससे अप्रभावित हुए बिना नहीं रहेगी. इस लिहाज से हमें इस बात का शुक्रगुजार होना चाहिए कि हमसे सबसे नजदीकी मैग्नेटर AXP 1E 1048-59 हमसे 9 हजार प्रकाशवर्ष की दूरी पर है जो कि कम दूरी नहीं है.

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