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‘दुश्मन का दुश्मन दोस्त’ ऐसा है चीन पाकिस्तान का दोस्ताना

नई दिल्ली- आपने ये कहावत सुनी होगी- ‘दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है.’ यही बात पाकिस्तान और चीन के रिश्ते पर एकदम फिट बैठती है. बीते कुछ वर्षों में ये दोनों देश इस तरह एक दूसरे के करीब आए, जैसे ‘सदाबहार दोस्त’ हों. लेकिन इस दोस्ती पर हमेशा ही विशेषज्ञों ने संदेह व्यक्त किया है. जिससे पता चलता है इस दोस्ती पर मिठास की परत तो है लेकिन भीतर केवल चालाकी, संसाधनों की लूट, खोखले वादे और चीनी कूटनीति छिपी हुई है. पाकिस्तान कम्युनिस्ट पार्टी (Communist Party) के नेतृत्व वाली पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (पीआरसी) को मान्यता देने वाले पहले देशों में से एक था.पाकिस्तान बाकी मुस्लिम देशों से चीन को जोड़ने के लिए एक कड़ी का काम करता है लेकिन इस बीच शिंजियांग के मुसलमानों को भुला दिया जाता है.

इनकी बिगड़ती दोस्ती का एक कारण चीन से भागकर पाकिस्तान आने वाले उइगर मुस्लिम (Uyghur Muslims China) भी हैं. जिन्हें चीन ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ईटीआईएम) का समर्थक मानता है. जो चीन से शिंजियांग क्षेत्र को अलग करना चाहता है. हालांकि दोनों ही देश भारत के विरुद्ध काम जरूरत करते हैं. इससे पता चलता है कि चीन और पाकिस्तान की दोस्ती स्वार्थ पर टिकी हुई है. चीन ने अमेरिका का प्रभाव कम करने के लिए पाकिस्तान को अपना ग्राहक बना लिया है. वह उसे सैन्य सहायता, कर्ज और राजनयिक संरक्षण प्रदान करता है. चीन तेजी से विकास कर रहे भारत के खिलाफ पाकिस्तान को एक कवच मानता है. वह पाकिस्तान के रास्ते भारत को अपने अधीन करना चाहता है.

अमेरिका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली सहायता रोक दी और यहीं से चीन को फंडिंग करने का मौका मिल गया. इतनी करीबी होने के बाद भी पाकिस्तान और चीन ने आज तक एक भी औपरचारिक गठबंधन संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. कर्ज में डूबे पाकिस्तान पर चीन को भरोसा नहीं रहा (China Pakistan India). यही वजह है कि पाकिस्तान में शुरू होने वाली कई योजनाओं पर अब तक हस्ताक्षर नहीं हुए हैं. चीन अपने हाथ पीछे खींच रहा है. उसे डर है कि उसका लगाया पैसा उसे वापस ही नहीं मिलेगा.

चीन अब पाकिस्तान को ज्यादा मदद नहीं दे पाएगा क्योंकि पहले से ही उसका पैसा यहां फंसा हुआ है. उसे कर्ज की रकम वापस नहीं मिल रही. चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा भी एक खोखले दावे की तरह रहा. पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग के बीच समझौता होने के बाद 2013 में सीपीईसी पर काम शुरू हुआ (CPEC in Pakistan). चीन ने 2014 में ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए सीपीईसी के तहत 46 अरब डॉलर खर्च करने की बात कही. उसने 2016 में सीपीईसी के लिए 51 अरब डॉलर के एक नए कर्ज की घोषणा भी की थी.

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